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ब्रह्मपिशाच प्रपंच – भाग 1

उसने देखा की शालिनी लगभग वस्त्रहीन होकर उसके ऊपर चढ़ बैठी है। दोनों हाथों से विनिता के मुंह को दबाकर ऐसा प्रयास कर रही है जैसे एक मदोन्मत पुरुष अपना नियंत्रण खोकर किसी स्त्री के साथ असभ्य व्यवहार करता है। यह इतना असमान्य था की विनिता भीतर तक दहल उठी। भय आतंक और अर्धनिद्रा ने उसके मस्तिष्क को विचार शून्य कर दिया।

तंत्र घटनाएं
grihasth tantra

ब्रह्मपिशाच प्रपंच -भाग 1

तंत्र के क्षेत्र में एक सामान्य व्यक्ति दो ही कारणों से जाता है। एक तो वह स्वयं शत्रुओं के अभिचार से पीडि़त रहा हो या दुसरा वह तंत्र क्षेत्र की शक्तियों के तरफ प्रबल आकर्षित। देवराज अपने 4 भाई बहनों में सबसे बडा़ था। 2 भाई देवराज और प्रियांश तथा 2 बहनें विनिता और शालिनी, माता पिता और दादा दादी के साथ अपने घर में रहते थे। पिछली होलिका की बात रही होगी, रात में होलिका जलने के बाद का समय रहा होगा। एकाएक सबसे छोटी बहन की तबियत खराब हो गयी। समस्या इतनी बढ़ गयी की रातों रात अस्पताल में भर्ती करवाना पडा़। जहां सारा दुनिया अगले दिन होली मनाया वहीं यह पूरा परिवार अस्पताल की ओर भागदौड़ करता रहा। 3 दिन तक अस्पताल में रखने के बाद छुट्टी मिल गयी और शालिनी को घर लाया गया। 18 वर्ष की अक्षत यौवना कन्या की समस्त सुंदरता जैसे इन तीन दिनों में निचोड़ ली गयी हो। रोज पानी चढा़ने के बावजूद भी शालिनी एकदम से सुख गयी थी। घर आने के बाद सभी भाई बहन और परिवार मिलकर उसका ख्याल रखने लगे। दो दिन बिता होगा। होलिका का अष्टक समाप्त हुआ था और अगले ही दिन एक विचित्र घटनाक्रम ने पुरे परिवार को झकझोड़ कर रख दिया। शालिनि सुबह सवेरे उठी और घर से गायब। पुरा परिवार घर से लेकर कॉलेज तक सभी जगह खोज लिये, वह नही मिली। हर सहेली और दोस्तों को फोन किया गया लेकिन कहीं कुछ पता नही चला। अब स्थिति बहुत भयप्रद थी क्योंकी एक जवान लड़की एकाएक घर से बिना कुछ बताये चली गयी। शाम तक कुछ पता ना चल पाने के कारण स्थानीय थाना में गुमशुदगी का रिपॉर्ट लिखा दिया गया। थानेदार साहब ने आश्वस्त किया और अपनी पूरी टीम को लगा दिया। हांलाकि ऐसा होता बहुत कम है लेकिन मुख्य निरिक्षक राजन,देवराज से स्कुल फ्रेंड थे और परिवार में आना जाना था, इसका थोडा़ फायदा हुआ। अगले दिन सुबह देवराज के एक दोस्त सन्नी का फोन आया की तुम्हारी बहन बांकाटोली खंडहर मस्जिद के पास बेहोश मिली है। भीड़ लगी हुई थी पुलिस भी आ चुकी थी। राजन भी पहुंच चुका था। अस्पताल में 3 घंटे बाद शालिनी को होश आया। उसे कुछ याद भी नही की वह कैसे वहां पहुंची। लड़की का मामला था, खबर मिडिया तक ना पहुंचे इसलिये जल्द ही उन्हें घर पहुंचा दिया गया। अब घर पर दादी मम्मी के आंचल में डरी सहमी शालिनि यह याद करने की कोशिश में थी की आखिर उसके साथ हुआ क्या था पर बह नाकामयाब रही। सब लोग डिस्टर्ब थे। खैर वह दिन बीता, फिर अगले सप्ताह तक सब कुछ सामान्य रहा। सभी अपनी काम और कॉलेज जाने लगे। फिर शनिवार की सुबह शालिनी गायब। यह बात अब बहुत ही ज्यादा परेशान करने वाली थी।

एक महीने तक इस तरह की बात होती रही। वह कभी कॉलेज जाती तो उधर से वापस नही आयी। घर में है तो कब कहां चली जाये पता ही ना चले। लेकिन खोजने पर वह सदैव उसी खंडहर के आस पास बेहोश मिलती थी।

बिहार राज्य के सीवान जिले की एक गांव की यह घटना थी। धन धान्य से सम्पन्न बलराम सिंह का परिवार सुख चैन से रहता था। बलराम सिंह की अपनी चिमनी थी और कई बीघा खेती का जमीन। अपने बुजुर्ग माता पिता , पत्नी और चारों के साथ हंसी खुशी से रहते थे। बडा़ बेटा देवराज एम बी ए की पढा़ई पुरी कर 2 साल लंदन में नौकरी कर पुनः गांव में आकर पिता के हर व्यवसाय में हाथ बंटा रहा था। उसके अपने स्टार्ट अप प्लानस् थे जिसके लिये वह प्रतिबद्ध होकर कार्य कर रहा था। छोटा भाई प्रियांश अपने बडे़ भाई के नक्शे पर चलता हुआ अभी एम बी ए कर रहा था कलकत्ता में रहकर। बाकी दोनों बहनें विनिता और शालिनी एक ही कॉलेज में स्नातक की पढा़ई कर रही थीं।

जिस समय शालिनी के साथ यह घटना आरंभ हुई छोटा भाई भी घर आया हुआ था। सभी शालिनी के इस प्रकार से गायब होने और बेहोश मिलने से सकते में थे। गांव में भी तरह तरह की बातें आरंभ हो गयी थीं। इस मामले में शालिनी से कडी़ पुछताछ इसलिये भी संभव नही हो पा रही थी क्योंकी जब से वह अस्पताल से वापस आयी थी बेहद कमजोर हो चुकी थी। गुलाब सी खिली रहने वाली शालिनी अब हमेशा गुमशुम रहती। विनिता हमेशा साथ रहती थी लेकिन ऐसा लगता था की वह भी अब समझ नही पा रही मामला। सवा महीने बीतने को आये और इतने दिनों में 4 बार यह गायब होने और बेहोश मिलने की घटना हो चुकी थी। बलराम जी ने अपनी पत्नी के साथ शालिनी और विनिता को उनके नैनिहाल भेजने का प्रबंध किया ताकि यह मामला पकड़ मे आये। गांव के लोग इन मामलों में बहुत चतुर होते हैं। यह सबके समझ में आ चुका था की कुछ अभिचारिक समस्या है किंतु चुंकी यह एकाएक हो रहा था और इसमें कोई आवेश इत्यादि भी नही आता था तो पकड़ना मुश्किल था। नैनिहाल 150 किलो मीटर दुर था देवरिया जिला उत्तर प्रदेश में। वे तीनों वहां चले गये। नैनिहाल में शालिनी के दो मामा मामी और नाना नानी थे। बडे़ मामा के दो बच्चे थे और छोटे मामा की नयी शादी हुई थी ।

नैनिहाल में सब कुछ 3 से 4 दिन तक ठीक रहा। सभी हंसी खुशी से बात चित्त करते और दिन गुजारते। मामाओं के अपने कपडे़ के मॉल थे तो वे वहां व्यस्त रहते। मामियां घर संभालती। चौथे दिन दोपहर से शालिनी की तबीयत बिगडी़ और उसे बहुत तेज बुखार हुआ। बुखार में वह केवल घर जाने की जिद करती रही। घर पर डॉक्टर आया सुई दवाई हुआ पर कोई फर्क नही। एक ही रट की घर जाना है। रात को जब दोनों मामा घर आयें तो हालत बिगडी़ पडी़ थी शालिनी की। छोटे मामा लड्डू लाये थे। ऐसा लगा जैसे लड्डु की खुशबु को सुंघ कर जान गयी हो शालिनी और असभ्य तरीके से झपट कर पैकेट छीन लिया। सब हक्के बक्के रह गये। शॉक तो तब लगा जब लगभग 2 किलो लड्डू सभी के सामने शालिनी ने मुंह में अपने ठुंस डाले और चट कर गयी। बिखरे बाल, अस्त व्यस्त कपडे़ और इतनी हड़बडी़ में मिठाई को निगलते देख हर कोई सकते में था। दोनों बच्चे तो डर कर मां से चिपक गये। लड्डु खत्म कर के बिना पानी पिये ही एक जोरदार मर्दाना डकार लेकर फिर सामान्य हो गयी शालिनी। सभी को अपनी ओर इस तरह आश्चर्यचकित होकर देखते पाकर गुर्रा कर बोली -“क्या हुआ कभी लड़की को लड्डु खाते नही देखे क्या??” किसी के मुंह से कोई शब्द नही। अगला आश्चर्य जो बुखार दवा इंजेक्शन से कम ना हो रहा था वह उतर चुका था ओर शालिनी चुपचाप सोने चली गयी थी।

उसी रात 1 बजे सभी शालिनी की रोने की आवाज सुन जग पडे़। पर उसका रोना थोडा़ अलग तरीके का था। रोते रोते चिल्ला पड़ती थी कि मुझे घर जाना है,वह अपने शरीर को पुरा ऐंठने लगी और खुब जम्भाई लेती। 15 – 20 मिनट तक ऐसे चिल्लाने के बाद वह सो गयी।

कमरे में विनिता और शालिनी सो रही थी। लगभग 2 बजे विनिता को अपने ऊपर किसी के होने का अहसास हुआ। हड़बडा़ कर आंखे खोली लेकिन हिल डुल ना पायी ना ही कुछ बोल पायी। उसने देखा की शालिनी लगभग वस्त्रहीन होकर उसके ऊपर चढ़ बैठी है। दोनों हाथों से विनिता के मुंह को दबाकर ऐसा प्रयास कर रही है जैसे एक मदोन्मत पुरुष अपना नियंत्रण खोकर किसी स्त्री के साथ असभ्य व्यवहार करता है। यह इतना असमान्य था की विनिता भीतर तक दहल उठी। भय आतंक और अर्धनिद्रा ने उसके मस्तिष्क को विचार शून्य कर दिया। पुरा जोर लगाने के पश्चात भी वह शालिनी को अपने ऊपर से हटा नही पा रही थी। उधर शालिनी का प्रयास अपनी सीमा को उल्लंघित कर किसी और ही दिशा में बढ़ चुका था जिसको रोकने हेतु वहां कोई नही था।

कुछ देर की उठापटक के बाद शालिनी उसके शरीर से अलग हो गयी। एकाएक शालिनी के द्वारा किये गये इस व्यवहार से आहत विनिता समझ ना सकी की उसे अभी क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिये। भय और अवसाद में रात बिता। अगले दिन बिल्कुल सुबह ही अपनी मां को सारी बातें बता डाली।

उधर शालिनी सुबह सुबह फिर गायब थी। लेकिन नैनिहाल में कहां गयी होगी। कुछ सोच पाते तभी उनके पडो़सी यादव जी घर आकर अविश्वसनीय सी बात बतायें। सभी दौड़ कर उनके घर पहुंचे जहां शालिनी बाल्टी में मुंह लगाये कच्चा दुध गटक रही थी। यह अविश्वसनीय इसलिये था क्योंकी ना ही उसे दुध पसंद था ना दुध से बनी कोई मिठाई ही। जबकी यहां तो सीधा कच्चा दुध ऐसे पी रही थी जैसे उसकी सबसे पसंदीदा पेय हो।

उसको बाल्टी छोड़ने हेतु बोलने पर वह और ही ढीढ़ जैसे गट गट आवाज करके पीना आरंभ कर दी। लगभग 5 लीटर दुध था जिसमें से आधा जमीन पर गिराई आधा पी गयी। एक लंबी डकार लेकर मुस्कुराते हुये चलती बनी।

उसके इस व्यवहार को देखकर बडे़ बुजुर्ग समझ चुके थे की यह कोई ऊपरी चक्कर की चपेट में है। लेकिन इस दुध वाली हरकत से और रात को किये गये विनिता के साथ दुर्व्यवहार से आहत और क्रोधित उनकी मां वहीं पकड़ कर चप्पल चप्पल कुटाई कर दी। सब रोकते रहें लेकिन 5-7 चप्पल तो पड़ ही गया। अब वहां से यह मामला और बिगड़ गया। मारने के बाद उसकी हाथ को पकड़ कर घर ले आयी और चिल्लाकर पुछने लगी आखिर तेरे को हुआ क्या है??? क्या चाहती है तु??? तेरे पेट में क्या कुंआ खुदा पडा़ है, घर का खाना नही मिलता।।। क्या है ये सब??? 😡😡

इतना कहना था की शालिनी विभत्स तरीके से हंसने लगी। ऐसी हंसी जो एक कमसीन लड़की कभी हंस ही नही सकती। और कहा की अन्न पर सबका अधिकार है जो पसंद है मुझे खाना वह तो मैं खाऊंगा ही ना 😁😁

खाउंगा का क्या मतलब है😡😡?? और तुझे दुध कब से पसंद आ गया। एक झापड़ गाल पर बडी़ जोरदार देते हुये मां ने पुछा। शायद उसके हंसने से मां का गुस्सा बढ़ गया था।

इस झापड़ के बाद शालिनी अपना आपा खो बैठी और वहीं पैर मोड़ कर जमीन पर बैठ गयी। -” मुझे मारती है तु। तेरी इतनी हिम्मत। तु समझती क्या है रे। देख अभी बताता हुं। पहले चप्पल से मारी और अब झापड़। इतना घमंड है तुझे की तु मुझ पर हाथ उठायेगी। आज तु देखेगी की मैं कौन हुं। और वह शरीर झुमना शुरु हो गया। शालिनी इतनी तेज झुम रही थी की अगर उसका सर दीवार से टकराता तो जरुर फुट जाता। वह ज्यादा कुछ बोल नही रही थी लेकिन झुमते हुये खुब हांफ रही थी।

उसकी ऐसी स्थिति से हर कोई सकते में आ गया। अगल बगल के लोग भी वहां आ गये। पास के ही एक झाड़ फुंक करने वाले शोखा को बुलाया गया। आते ही शोखा ने पुछना शुरु किया की कौन है रे तुम और काहे इस लड़की पर आया है?? जबाब मिला -” तुमसे मतलब। तुम यहां काहे आया है” शोखा ने कहा अपना परिचय दे ताकी पता तो चले की कौन है तु। शालिनी- तेरा बाप का नौकर हैं जो तेरा जबाब देंगे। शोखा है ना तू तो बुलवा ले मेरे मुंह से। शोखा- अरे काहे भड़क रहा है। हम कुछ करेंगे थोडी़, बस बता दे कौन है तु और का चाहता है??

अब जो हुआ वो वहां उपस्थित सभी के मन में भय उत्पन्न कर दिया। शालिनी झुमना छोड़ तेजी से खडी़ हुई और एक लात शोखा के छाती पर। और अगले ही पल उसके ऊपर बैठ ले लात दे घुंसा। लोगों के पकड़ते और रोकते भर में शोखा बाबा दम भर कुटा चुके थे। सोचने संभलने का मौका दिये बिना ही एक्सन हो गया।

सब खुब जोर से शालिनी को पकड़ कर शोखा से अलग किये। अलग होते ही शोखा कुछ करते तब तक शीश के बाल के कुछ भाग को जोर से पकड़ कर शालिनी उखाड़ डाली। और उस बाल को अपने पास रख कर बोली। कर ले जो करना है। यह दुर्दशा करने के बाद शालिनी अपनी दांत कटकटाते हुये हंसने लगी। शोखा को काटो तो खुन नही इतनी तैयारी के साथ आया नही था वो। उसके द्वारा किया गया स्वयं का बंधन कोई काम नही आया। समझ गया की कोई जबरदस्त शक्ति से पाला पडा़ है। उसकी यह हालत देखकर घर के सभी लोग भय के आवरण में लिपट गये। किसी को कुछ ना सुझा। लेकिन अगल बगल के लोगों ने हिम्मत दिया और आस पास के गांव से उसदिन लगभग 3 और जानकार आये। चुंकी अभी इन बातों का हल्ला हुआ नही था तो केवल झाड़ फुंक के नाम पर ही सब उन्हें ला रहे थे। वास्तविक मामले की जानकारी ना होने के कारण सभी लापरवाही का शिकार हो रहे थे। और फिर हल्ला हो गया सब तरफ की कोई तगडी़ चीज है जिसने इस लड़की को अपने अधिकार में ले रखा है।

बलराम जी तक भी सभी बात पहुंच गयी थी। देवराज पिता और घर की इस विपदा की स्थिति देखकर , निपटने हेतु आगे आया और अपने मित्र के साथ एक प्रसिद्ध जानकार संजय भगत से मिलने पहूंचे। तथा उनको सारी बातों से अवगत कराया। संजय एक वाममार्गी अघोर साधक थे। उन्होंने कामरु कामाख्या में रहकर कितने ही वर्ष साधना में बिताये थे। अनेक रहस्यों को जानने वाले थे। सारी बातें सुनकर उन्होंने कुछ विशेष तंत्रोक्त्र सामग्रीयों की सूची तैयार कर देवराज को दी तथा अगले दिन उनके नैनीहाल चलने हेतु कहा। सारी तैयारी कर अगले दिन शाम को वे तीनों लोग(देवराज, उनके मित्र तथा संजय) देवरिया निकल गये।

उनके आने की जानकारी किसी को नही थी, यहां तक की मां को भी नही। संजय ने ही मना किया था। संजय एक सामान्य टीशर्ट और जिन्स में ही बिना किसी बाह्य तंत्र आवरण के गये थे ताकी कोई जान ना सके। गाडी़ के शहर में प्रवेश करते ही पहले मंदिर पर रुक कर उन्होंने कुछ विशेष तंत्र क्रियांये की। वह मंदिर प्राचीन शिव मंदिर था। वहां से फिर पहुंचे इनके घर। घर पहुंचने पर सब कुछ सामान्य था। कोई भी बाह्य ऊर्जा का नकारात्मक प्रभाव सीधे सीधे बिल्कुल ना दिखा। सामान्य नाश्ता पानी हुआ और फिर प्रतीक्षा होने लगे रात के मध्यकाल की। उस समय तक शालिनी भी उस दिन एकदम सामान्य थी। कोई हरकत नही। जब रात का 11 बजा तब एक कमरा जो पहले से ही संजय के कहे अनुसार साफ सफाई करके तैयार था वहां संजय और देवराज पहुंचे। एक छोटा सा मंडल पृथ्वी पर बनाकर तैयार किया। फिर नहा धोकर काले वस्त्र धारण किये। अभिमंत्रित भस्म से श्रृंगार किये अपने ललाट को और विभिन्न तंत्रोक्त कवचों को मंत्र जाप करते हुये धारण किया। तत्पश्चात आसन पर बैठ विभिन्न मुद्राओं द्वारा आसन बंधन किया तथा मंडल का संक्षिप्त पूजन कर अपने आराध्य वचन बद्ध देव का आवाह्न किया। वातावरण में बदलाव आने लगा। अभी आवाह्न हेतु तंत्र क्रिया कर ही रहे थे की तभी शालिनी एकदम झटके से उस कमरे में पहुंच गयी। घर के लोग उसे वहां जाने से रोक ही नही पाये क्योंकी वह बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रही थी। वहां पहुंचते ही पहला शब्द उसने कहा -धोखा ! यहां तुम लोग मुझे धोखा देना चाहते हो। नही हो पाओगे सफल।

कमरे में अभी वह दरवाजे के पास ही खडी़ थी और चिल्ला रही थी। संजय के दाहिनी ओर दरवाजा थी और बायीं ओर मंडल पूजन का स्थान। संजय एकादशनी मुद्रा दिखाकर जैसे ही मंडल को प्रणाम किया। आवाहन की प्रक्रिया पूर्ण हुई और वह आ गये जिनकी प्रतीक्षा थी। शालिनी को ठीक पीछे से एक जबरदस्त लात पडी़ और वह लगभग उछलकर मंडल के पास गिर पडी़। वहां गिरते ही वह संभल पाती और कुछ बोल पाती की उसके ऊपर तंत्रोक्त भस्म फेंक कर संजय ने उसे कीलित कर दिया। अब वह कुछ हद तक नियंत्रण में थी। सभी लोग कमरे में आ गये थे। लेकिन मां और मामाओं के सिवाय सभी को जाने का निर्देश दिया संजय ने। वहां अब दोनों मामा, देवराज, उनका मित्र, मां और अघोर साधक संजय थे और थी रहस्यों में लिपटी किलित पडी़ किसी प्रेत पिशाच से आबद्ध शालिनी।

अगले भाग में पढें क्यों तंत्र के मार्ग को एक दिशा का मार्ग कहते हैं। यहां की गलती कितनी मंहगी पड़ती है। एक चुक और सब मामला हाथ से बाहर। साधक ,तांत्रिक या सेवक जो इस क्षेत्र में आते हैं उनको क्यों सचेत रहना पड़ता है। यहा प्रपंच कैसे करती है पैशाचिक शक्तियां पढें अगले भाग में।

मेरी यह कहानी सत्य घटना से प्रेरित है स्थान,परिवार,सदस्य,मुख्य पात्र इत्यादि में बदलाव है। यह कथा गृहस्थ तंत्र के संस्थापक रूद्रांश के द्वारा प्रकाशित की गयी है।इस सत्य कथा के किसी भी प्रकार के अंश को कोई तोड़ मरोड़ कर या इसी रूप में किसी अन्य बेवसाइट आदि पर प्रकाशित करता है तो वह कानुनी कारवाई हेतु जिम्मेदार है।

अगला भाग शीघ्र ही।।